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सार-सरिता

सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ हिमालय पर तपस्या कर रहे थे। वे गंगा को धरती पर लाना चाहते थे। उनके पूर्वज कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गए थे। गंगा ही उनका उद्धार कर सकती थीं। भागीरथ अन्न जल छोड़कर तपस्या कर रहे थे। गंगा उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हो गई। भागीरथ ने धीरे स्वर में गंगा की आवाज सुनी। महाराज मैं आपकी इच्छानुसार धरती पर आने के लिए तैयार हूं, लेकिन मेरी तेज धारा को धरती पर रोकेगा कौन। अगर वह रोकी न गई तो धरती के स्तरों को तोड़ती हुई पाताल लोक में चली जाएगी।

भागीरथ ने उपाय पूछा तो गंगा ने कहा, महाराज भागीरथ, मेरी प्रचंड धारा को सिर्फ शिव रोक सकते हैं। यदि वे अपने सिर पर मेरी धारा को रोकने के लिए मान जाएं तो मैं पृथ्वी पर आ सकती हूं। भागीरथ शिव की आराधना में लग गए। तपस्या से प्रसन्न हुए शिव गंगा की धारा को सिर पर रोकने के लिए तैयार हो गए। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष के दशहरे के दिन जटा खोलकर, कमर पर हाथ रख कर खड़े हुए शिव अपलक नेत्रों से ऊपर आकाश की ओर देखने लगे।

भागीरथ ने प्रार्थना की तो ऋषि ने गंगा को मुक्त कर दिया

गंगा की धार हर हर करती हुई स्वर्ग से शिव के मस्तक पर गिरने लगी। जल की एक भी बूंद पृथ्वी पर नहीं गिर रही थी। सारा पानी जटाओं में समा रहा था। भागीरथ के प्रार्थना करने पर शिव ने एक जटा निचोड़ कर गंगा के जल को धरती पर गिराया। शिव की जटाओं से निकलने के कारण गंगा का नाम जटाशंकरी पड़ गया।

गंगा के मार्ग में जहृु ऋषि की कुटिया आई तो धारा ने उसे बहा दिया। क्रोधित हुए मुनि ने योग शक्ति से धारा को रोक दिया। भागीरथ ने प्रार्थना की तो ऋषि ने गंगा को मुक्त कर दिया। अब गंगा का नाम जाहृनवी हो गया। कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर गंगा ने भागीरथ के महाराज सगर आदि पूर्वजों का उद्धार किया। वहां से गंगा बंगाल की खाड़ी में समाविष्ट हुई, उसे आज गंगासागर कहते हैं।

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