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सार-सरिता

एक चिडिय़ा थी वह बहुत ऊंची उड़ती थी। इधर-उधर चहचहाती रहती। कभी इस टहनी पर तो कभी उस टहनी पर फुदकती रहती। पर उस चिडिय़ा की एक आदत थी। वह जो भी दिन में उसके साथ होता अच्छा या बुरा उतने ही पत्थर अपने पास पोटली में रख लेती और अकसर उन पत्थरों को पोटली से निकाल कर देखती। अच्छे पत्थरों को देखकर बीते दिनों में हुई अच्छी बातों को याद करके खुश होती और खराब पत्थरों को देखकर दुखी होती।

चिडिय़ा ऐसा रोज करती। रोज पत्थर इकट्ठा करने से उसकी पोटली दिन-प्रतिदिन भारी होती जा रही थी। थोड़े दिन बाद पोटली पत्थरों से पूरी तरह भर गई। चिडिय़ा को भरी पोटली के साथ उडऩे में दिक्कत होने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उठ क्यों नहीं पा रही। कुछ समय और बीता, पोटली और भारी होती जा रही थी। अब तो उसका जमीन पर चलना भी मुश्किल हो रहा था।

एक दिन ऐसा आया कि उसे खाने-पीने का इंतजाम करना भी मुश्किल हो गया और अपने पत्थरों के बोझ तले मर गई। ऐसा ही हमारे साथ होता है, जब हम पुरानी बातों की पोटली अपने साथ रखते हैं। अपने वर्तमान का आनंद लेने की जगह भूतकाल की बातों को ही सोचने में लगे रहते हैं। इसलिए हमें भूतकाल को छोड़कर वर्तमान में जो पल गुजर रहे हैं, उनका आनंद लेना चाहिए।

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