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worship lakshmi

घर में सुख, शांति और समृद्धि के लिए

हिंदू धर्म में धन और समृद्धि से संबंधित कुछ देवी और देवता हैं जिनकी दीपावली के दिन पूजा किए जाने का प्रचलन रहा है। वैसे तो दिवाली के शुभ दिन महालक्ष्मी की पूजा का विधान है लेकिन महालक्ष्मी पूजन के साथ ही अन्य देवी और देवताओं की पूजा किए जाने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है…

लक्ष्मीजी :

भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। देवी लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं। इनकी अकेली इस रूप की तस्वीर पूजाघर में रखें। हालांकि इनके साथ और भी कई देवी और देवताओं की पूजा का प्रचलन है।

गणेश :

प्रथम पूज्य गणेश के नाम के साथ ही हर शुभ, लाभ व मंगल कार्य का शुभारंभ होता है। गणेशजी के दाएं ओर स्वास्तिक तथा बाएं ओर ॐ का चिन्ह बनाया जाता है। यह वास्तु अनुसार सुख-शांति और समृद्धि देने वाला है। गणेशजी हमारी समृद्धि का प्रथम प्रतीक हैं। माता लक्ष्मी के साथ इनकी पूजा का भी प्रचलन है।

कुबेर :

रावण के सौतेले भाई कुबेर को भगवान शंकर ने ‘धनपाल’ होने का वरदान दिया था। इन्हें यक्ष भी कहा गया है। देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को पूजने से भी पैसों से जुड़ी तमाम समस्याएं दूर रहती हैं। लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती के साथ ही कुबेर का भी एक चित्र रखें। दिवाली के 3 दिन पूर्व धनतेरस का दिन कुबेर की पूजा का दिन है।

सरस्वती :

मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा शास्त्र ज्ञान को देने वाली हैं। ज्ञान के बल पर ही धन और बल की वृद्धि होती रहती है। बिना ज्ञान धन और समृद्धि का होना व्यर्थ ही माना जाता है इसीलिए धन की देवी लक्ष्मी के साथ सरस्वती की भी पूजा का महत्व है। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है।

काली :

राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर के स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई जबकि इसी रात इनके रौद्र रूप काली की पूजा का विधान भी कुछ राज्यों में है।

अत: दीपावली पर लक्ष्मी के साथ कालिका माता की पूजा भी होती है। अत: कुबेर देव एक यक्ष, गणेशजी एक देव और सरस्वती एवं कालिका दो माता। इसके अलावा धनतेरस पर धनवंतरि, नरक चतुर्दशी पर कृष्ण, गोवर्धन पूजा के समय गाय, भाईदूज पर यमदेव की पूजा होती है।

पूजन सामग्री

आसन, पंचपात्र, आचमनी, त्रिमानी (प्लेट), तांबे का लोटा, लकड़ी की चौकी, पीला वस्त्र, लाल वस्त्र, जलपात्र, घंटी, शंख, कुमकुम, मौली, अक्षत (चावल), अबीर, गुलाल, सिंदूर, यज्ञोपवीत, सुपारी, लौंग, इलायची, घृत, दीपक, अगरबत्ती, रूई, केसर, पुष्प, पुष्प माला, दूर्वा, गुड़, प्रसाद (दूध से बना), पंचमेवा, कच्चा दूध, दही, शहद, शक्कर, पान, पंचपल्लव (आम, अशोक, पीपल, बड़, कनेर), पंचरत्न या चांदी का सिक्का, इत्र, अष्टगंध, चांदी का वरक, शृंगार सामग्री-काजल, हंगुल, दर्पण, तेल, कंघी, मेहंदी आदि, ऋतु फल, नारियल, गंगाजल, बतासे, महल-मालियां (शक्कर के खिलौने), गन्ना, फुलियां आदि, मिट्टी के दीपक।

दीपोत्सव पर अष्ट लक्ष्मी को करें प्रसन्न

हमारे शास्त्रों द्वारा लक्ष्मीजी आठ प्रकार की मानी गई हैं, जिन्हें अष्टलक्ष्मी कहा जाता है…

आयु लक्ष्मी : शास्त्रानुसार पहला सुख निरोगी काया माना गया है। अत: आरोग्य व आयु को भी लक्ष्मी माना गया है।

धान्य लक्ष्मी : व्यक्ति चाहे कितना भी धनाढ्य क्यों न हो उसकी भूख धन से नहीं अपितु भोजन से ही मिटती है इसलिए धान्य को भी लक्ष्मी माना गया है।

गृहलक्ष्मी : शास्त्रों में पत्नी को लक्ष्मी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि पुरुष कितना भी पुरुषार्थ क्यों न करें लक्ष्मी स्त्री के भाग्य से ही आती है।

संतान लक्ष्मी : सुशील व आज्ञाकारी संतान का होना भी किसी अमूल्य धन से कम नहीं होता इसलिए शास्त्रों में संतान को लक्ष्मी माना गया है।

गजलक्ष्मी : गजलक्ष्मी से तात्पर्य पशुधन से है। वर्तमान में इसका स्थान वाहन ने ले लिया है। प्राचीनकाल में पशुधन को भी लक्ष्मी माना जाता था।

विजय लक्ष्मी : विजय लक्ष्मी अर्थात पद-प्रतिष्ठा, शास्त्रों में यश व सामाजिक प्रतिष्ठा को भी लक्ष्मी माना गया है।

विद्या लक्ष्मी : हर मनुष्य के लिए विद्याध्ययन जरूरी है। विद्या को लक्ष्मी माना गया है।

धन लक्ष्मी : यह लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रचलित स्वरूप है। शास्त्रानुसार चल-अचल संपत्ति को लक्ष्मी माना गया है। संपूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए इन अष्टलक्ष्मी की आराधना व प्राप्ति आवश्यक है।

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