lord shiva

देवों के देव महादेव

आशुतोष शिव की यह विशेषता है कि वह मनुष्याकृति रूप में मंदिरों के बाहर, भीतर या कहीं बाग-बगीचों में विराजमान दिखते ही हैं, लेकिन लिंग रूप में भी यथेच्छ दृश्य होते हैं। इसीलिए शिव को जन-गण-मन का देवता कहा जाता है…

इसलिए कहते हैं आशुतोष :1

पाषाण खंड के रूप में हालांकि विष्णु और शिव दोनों ही पूज्य हैं, परंतु शालिग्राम विष्णु कहीं भी गोल-मटोल पिण्डी या लिंग रूप में नहीं पूजे जाते हैं। दरअसल आशुतोष का मतलब होता है कि जो थोड़े से ही प्रसन्न हो जाए। भगवान् शिव अपने भक्तों से बड़े ही जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।

अगर कोई भक्त सच्चे हृदय से उनकी भक्ति करता है तो भगवान् शिव बहुत जल्दी ही उस भक्त की पुकार सुन लेते हैं। इसलिए भगवान् शिव का अन्य नाम आशुतोष भी है। सबके लिए सुगम, जो भी मिले उसी वस्तु चाहे वो पत्ता हो, फूल हो या फल या फिर अंजलि भर जल ही क्यों न हो, अर्पण करने से ही इन्हें खुश किया जा सकता है। इसीलिए शिव का एक नाम आशुतोष (यानी जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता) है।

लिंग का रहस्य :

लिंग शब्द का अर्थ है, जिससे सब पैदा हो और जिसमें सब कुछ लीन हो जाए। इसका अर्थ है- बीज, सूक्ष्म या नैनो चिह्न, निशानी, प्रतीक। अत: अनन्त, शून्य, आकाश, ब्रह्मांड का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्द पुराण में तो साफ कहा गया है कि अनन्त आकाश ही स्वयं लिंग है। धरती उसकी पीठ है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि पुराणों में लिंग के आदि अंत को खोजने संबंधी जो कथाएं मिलती हैं, उनका रहस्य यही है कि लिंग सीधे-सीधे यूनिवर्स या ब्रह्मांड का ही अक्स है। 3

प्रकृति का मानवीकरण :

शिव को पंचमुख कहते हैं, क्योंकि पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पांच तत्व ही शिव के पांच मुख हैं। योगशास्त्र में पंच तत्वों के रंग लाल, पीला, सफेद, सांवला, काला बताए गए हैं। इनके नाम भी सद्योजात (जल), वामदेव (वायु), अघोर (आकाश), तत्पुरुष (अग्नि), ईशान (पृथ्वी) हैं। अत: ब्रह्मांड के मानवीकरण और जीवन के योग-वियोग और स्थिति के कारण और कार्य स्वयं ही होने से पंचमुख होना बताया गया है।

आदि रचना जल ही शिव है :

आदिदेव शिव की आदिमूर्ति पहली रचना जल ही है। शिव की आठ प्रत्यक्ष मूर्तियां कही गईं हैं। अर्थात इनमें से किसी एक से भी मन लगा लें और उसका आदर, सत्कार, पूजा, नमस्कार करें तो भी शिवजी की साक्षात् पूजा न करने पर भी शिव पूजा का फल मिलता है।

प्रथम मूर्ति जल

प्रथम मूर्ति जल है। अत: जल और जल के स्रोतों का आदर और सदुपयोग करें।

द्वितीय मूर्ति अग्नि

द्वितीय मूर्ति अग्नि का निरादर न करना, हवन यजन करना, जहां हवनादि होता हो वहां बाधा न पंहुचाकर नमस्कार करना भी शिव पूजा है।2

तीसरी मूर्ति अन्न

तीसरी मूर्ति अन्न है। अत: थाली में झूठा न छोडऩा, अन्न का दान सहयोग करना, अकेले या छिपकर न खाना, मिल बांटकर खाना शिव पूजा का तीसरा सरल रूप है।

चौथी मूर्ति भक्त

चौथी मूर्ति पूजा, अर्चना इबादत करने वाला मनुष्य है। यज्ञ, पूजा, प्रार्थना करते हुए व्यक्ति को कष्ट न पंहुचाना, ऐसे भक्तों का यथा शक्ति आदर सत्कार करना, कुछ न दे सकें तब भी कम से कम उनके प्रति मधुर वचन बोलना भी शिवपूजा है।

पांचवीं मूर्ति सूर्य

पांचवीं मूर्ति सूर्य है। अत: दोनों संध्याओं के समय कुछ पूजा करना, न खाना, न सोना, सत्य, मधुर बोलना, पहले से ही तीखी बहस चल रही हो तो क्षणभर का विश्राम ले लेना और रोजाना सूर्य देव को प्रणाम करना भी शिवपूजन है।4

छठी मूर्ति शब्द

छठी मूर्ति शब्द है। शास्त्र कहता है कि संसार में कोई भी शब्द ऐसा नहीं है, जिसमें मंत्र बनने की ताकत न हो। अत: नाप तोलकर न बोलना, बेकार बोलना, कटु, अप्रिय और झूठ बोलना, झूठे आरोप, झूठी गवाही, शब्दों के साथ जालसाजी करने से शब्द ब्रह्मा या शब्द रूप भगवान शिव का निरादर होता है।

सातवीं मूर्ति आकाश या शून्य

सातवीं मूर्ति आकाश या शून्य है। अत: शून्य के आकार के तुल्य साक्षात् शिवलिंग की पूजा करना वास्तव में सर्वसाधारण शिवपूजा है।

आठवीं मूर्ति प्रकृति

आठवीं मूर्ति सर्वबीज प्रकृति और सबके भीतर घट-घट वासी प्राण हैं। किसी भी रूप में जीवनदान, जीवन रक्षा, प्रकृति के खजाने की सुरक्षा सदुपयोग, आग, पानी, धरती, हवा को प्रदूषित न करना और प्राणियों की नि:स्वार्थ सेवा भी शिवपूजा ही है।

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