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आखिर क्या होता है न्यूक्लियर बटन?

वॉशिंगटन
नए साल के मौके पर इस बार न्यूक्लियर बटन की खूब चर्चा हुई। नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग ने नए साल पर अपने भाषण में कहा कि मेरे ऑफिस की मेज पर न्यूक्लियर बटन है और पूरा अमेरिका हमारी न्यूक्लियर मिसाइलों की जद में है। जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्वीट कर कहा कि मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, जो किम के बटन से ज्यादा बड़ा और शक्तिशाली है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या न्यूक्लियर बटन जैसी कोई चीज वास्तव में है भी? दरअसल बटन शब्द का आशय हम जिस स्विचनुमा चीज से लगाते हैं, वैसा परमाणु हथियारों के मामले में नहीं होता। यहां न्यूक्लियर बटन दबाने का मतलब न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करने से है। परमाणु हथियारों का इस्तेमाल बटन दबाने की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। अमेरिका की ही बात करें तो यहां राष्ट्रपति के पास हर समय परमाणु हथियारों को इस्तेमाल करने का अधिकार होता है। इससे जुड़े आर्मी अफसरों का समूह और जरूरी चीजें न्यूक्लियर ब्रीफकेस भी कहलाती हैं।

राष्ट्रपति जब देश से बाहर भी होते हैं, उनके साथ यह टीम रहती है। इसमें आर्मी अफसरों के अलावा कम्युनिकेशन टूल्स और विस्तार से वॉर प्लान की डिटेल्स लिए हुए एक किताब भी होती है। अगर राष्ट्रपति को हमले का आदेश देना है तो उन्हें पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) के सैन्य अधिकारियों से एक खास कोड के माध्यम से संपर्क करना होगा। यह कोड सिर्फ राष्ट्रपति के पास होता है और इसी से उनकी पहचान होती है। इसी को सामान्य भाषा में न्यूक्लियर बटन या न्यूक्लियर ब्रीफकेस कहते हैं।

ये है भारत की स्थिति

भारत में परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े किसी भी फैसले के लिए न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी (एनसीए) है। यही इसकी कमांड, कंट्रोल और इस्तेमाल से जुड़े फैसले करती है। इसमें दो काउंसिल हैं-पॉलिटिकल काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल। पॉलिटिकल काउंसिल के प्रमुख प्रधानमंत्री होते हैं जबकि एग्जीक्युटिव काउंसिल के मुखिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) होते हैं। जब भी जरूरी होगा एग्जीक्युटिव काउंसिल परमाणु हमले की सिफारिश पॉलिटिकल काउंसिल से करेगी। दोनों स्तर पर फैसला लिए जाने के बाद एनसीए के आदेश को अमल में लाने का काम स्ट्रैटिजिक फोर्सेज का होता है।

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