कांगड़ा। आज देश भर में नाग पंचमी मनाई जा रही है। यह दिन नाग देवता की आराधना और उनसे कृपा प्राप्त करने का अवसर होता है। मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा करने से कालसर्प दोष जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। देश भर में ऐसी कई जगहें है जो नागों की भूमि कही जाती है। इन्ही में से हिमाचल को भी नागों का निवास स्थान माना जाता है। इन्हीं में से एक है- नूरपुर नागनी माता का मंदिर है। जहां सांप-बिच्छू व अन्य जहरीले जीव-जंतुओं के काटने का उपचार मात्र पानी पिलाकर व मिट्टी का लेप लगाकर किया जाता है। विश्वास है कि सर्पदंश का जो भी रोगी एक बार माता नागनी की शरण में पहुंच जाता है, वह ठीक होकर ही घर जाता है।
नागनी माता का इतिहास
इस मंदिर के अस्तित्व में आने को लेकर एक दंतकथा प्रचलित है। जिसके अनुसार, सदियों पहले इस जगह पर एक घना जंगल हुआ करता था। यहां पर राजा जगत सिंह का साम्राज्य था। यहां पर बहने वाली जलधारा का पानी लोग पीने व नहाने के लिए प्रयोग में लाते थे। यहां पर बामी मिट्टी के टिल्ले थे जिस पर अक्सर लोग दूध व जल चढ़ाते थे। उसके बाद एक कोढ़ी यहां पर आकर रहने लगा। वह भगवान से कोढ़ मुक्ति के लिए लगातार प्रार्थना करता था। बताते हैं कि उसकी साधना सफल होने पर नागनी माता ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए तथा उसे नाले में दूध की नदी दिखाई दी। सुबह उठकर उसने वास्तविक रूप में इस जगह पर दूध की नदी बहती देखी, जो कि वर्तमान में मंदिर के साथ बहते नाले के रूप में है। माता ने कहा कि इस नदी में नहाने व यहां की मिट्टी शरीर पर लगाने से उसका कुष्ठ रोग दूर हो जाएगा। उसने यहां पर स्नान किया व मिट्टी का लेप अपने जख्मों पर किया, जिसके बाद उसका कोढ़ रोग ठीक हो गया। उसी ने ही अपने साथ घटित इस घटना बारे सभी को अपनी आपबीती बताई। जिसके बाद इस स्थान पर अब तक सर्पदंश के अलावा चर्मरोग के लाखों मरीज ठीक हो चुके हैं।
मंदिर का स्थापना
मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित दंतकथा के अनुसार, एक सपेरे ने माता नागनी के मंदिर में आकर उसे धोखे से अपने पिटारे में बंद कर लिया। जब माता ने रात को राजा जगत सिंह को दर्शन दिए तो उसने सपेरे से उसे छुड़ाने की प्रार्थना की। जब वह सपेरा नूरपुर के कंडवाल में रुका तो राजा ने उस सपेरे से नागिन को मुक्त करवाया व भडवार में पुनः उसको उसके अपने असली स्थान पर पहुंचाया। नागनी माता को नागों की देवी सुरसा माता के नाम से भी जाना जाता हैं। मेलों के दौरान या बीच- बीच में श्रद्धालुओं को नागनी के रूप में मां के साक्षात दर्शन जलधारा में, मंदिर के गर्भगृह में या प्रांगण में होते रहते हैं। उनका रंग कभी तांबे जैसा होता है और कभी स्वर्ण तो कभी दूधिया और कभी पिंडी के ऊपर बैठी नागनी दिखाई देती है।
मंदिर के पूजारी
बताते हैं कि यहां के राजपूत घराने के पुराने बाशिंदे जो ठाकुर मैहता परिवार से संबंध रखते थे, वही इस मंदिर के मुख्य आराधक थे। इन परिवारों की कम से कम 60 पीढ़ियां अब तक इस मंदिर में पुजारी के रूप में अपना दायित्व निभा चुकी हैं। आज भी इस खानदान के 32 परिवार बारी-बारी से मंदिर में पूजा-अर्चना का जिम्मा संभाल रहे हैं।
मंदिर तक कैसे पहूंचे
पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग पर नूरपुर में बसे एक छोटे-से गांव नागनी (भडवार) में माता नागनी का मंदिर है। यहां पर सावन माह में ही नहीं, अन्य दिनों में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही लगी रहती है, जबकि इन दिनों सावन माह में श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहती है और मेलों का आयोजन होता है।