हिमाचल प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भाजपा विधायकों के अचानक वॉकआउट ने सदन की कार्यवाही को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार सत्ता के अहंकार में विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है, जबकि सरकार का तर्क है कि भाजपा सिर्फ राजनीतिक नौटंकी कर रही है। लेकिन इस राजनीतिक शोर-शराबे के बीच असली सवाल यह है….क्या सदन जनता के मुद्दों पर चर्चा के लिए बैठा था या राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन के लिए?
भाजपा का दावा है कि उनके सवालों को नियमानुसार नहीं सुना गया, जिसके चलते उन्हें विरोध दर्ज करने का रास्ता चुनना पड़ा। विपक्ष की यह नाराज़गी लोकतंत्र में स्वाभाविक है, परंतु बार-बार का वॉकआउट विधानसभा की गरिमा और जनहित दोनों पर सवाल खड़े करता है। सदन जनता की समस्याएं हल करने का सर्वोच्च मंच है, और जब वही मंच राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बनकर रह जाए तो नुकसान सीधा जनता को ही होता है।
सरकार और विपक्ष के बीच तकरार नई नहीं है, लेकिन सत्र के दौरान यह टकराव जब हद से बढ़ जाए तो विकास के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, सड़क सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और घाटे में चल रहे बोर्ड-निगम जैसे वास्तविक विषय चर्चा की प्रतीक्षा में रह जाते हैं। विपक्ष का आक्रामक रुख और सरकार का बचाव—दोनों ही स्थितियां जनता की उम्मीदों से कमतर साबित होती हैं।
विधानसभा जनता की आवाज बुलंद करने का मंदिर है, न कि राजनीतिक जूतम-पैजार का मंच। भाजपा का वॉकआउट हो या सरकार का रवैया—दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए। जनता ने प्रतिनिधियों को लड़ने के लिए नहीं, बल्कि समस्याओं का हल खोजने के लिए भेजा है। जब तक सत्र में राजनीति हावी रहेगी, जनहित हाशिये पर ही रहेगा। सदन तभी सार्थक होगा जब दोनों पक्ष राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठकर जनता के मुद्दों पर एकजुटता से काम करेंगे।