जमीन फटकर मधुमक्खियों के रूप में शक्ति प्रकट होने की मान्यता, शक्ति ग्रहण तक खुले आसमान के नीचे रहेंगे देव रथ और देवलू
सैंज। क्षेत्र की परिक्रमा पूरी करने के बाद सृष्टि निर्माता देव श्री बड़ा छमाहूं का देव रथ लौल कंढा की चोटी पर पहुंच गया है। अब यहां देवता और देवलू खुले आसमान के नीचे रहकर शक्ति अर्जित करने की परंपरा पूरी करेंगे। इससे पहले देव रथ ने खणी, थाटीबीड़, पलदी, धाऊगी, कानोंन और लौल सहित विभिन्न क्षेत्रों की परिक्रमा की। देव परंपरा के अनुसार शक्ति ग्रहण पूर्ण होने पर देव रथ के आगे जमीन फटने और वहां से मधुमक्खियों के गुबार के रूप में शक्ति प्रकट होने की मान्यता है। यह शक्ति देवता के मुख्य मोहरे में विराजमान होती है।

इसके बाद गुर-पुजारी विधि-विधान से स्थान को बंद करते हैं और देव रथ को विशेष वस्त्र ‘घुंडा से ढक दिया जाता है। इसके बाद देव रथ शक्ति रूपी मधुमक्खियों के साथ दलयाड़ा पहुंचता है। यहां पलदी छमाहूं, खणी छमाहूं, धामणी छमाहूं और देवी शक्ति समेत अन्य देव शक्तियां पहले से मौजूद रहती हैं। मान्यता है कि यहां शक्ति का वितरण अन्य देव रथों में किया जाता है। देव श्री बड़ा छमाहूं को छह दिव्य शक्तियों का सामूहिक स्वरूप माना जाता है। यह परंपरा क्षेत्र की प्राचीन देव संस्कृति और लोक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लौल कंढा में प्रवेश प्रतिबंधित
शक्ति ग्रहण की गुप्त प्रक्रिया के दौरान लौल कंढा में ब्लॉगर्स, पत्रकारों और पर्यटकों का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। वीडियो और फोटोग्राफी भी वर्जित होगी। हारीयान, कारदार और देवता कमेटी ने लोगों से सहयोग की अपील की है। पत्रकारों से आग्रह किया गया है कि कमेटी और पुजारी द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी को ही प्रकाशित करें।








