मौसम के बदलते तेवरों ने तोड़ी बागवानों की उम्मीदें, सेब सीजन पर संकट के बादल, भारी ड्रॉपिंग से बढ़ी चिंता
ठियोग। प्रदेश में सेब सीजन शुरू होने से पहले ही बागवानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। मई माह के अंतिम सप्ताह में ऊपरी और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के छोटे फलों की भारी ड्रॉपिंग (फ ल गिरना) ने इस वर्ष की फसल को लेकर गंभीर आशंकाएं पैदा कर दी हैं। उपरी शिमला के ठियोग, कोटखाई, रोहड़ू, चौपाल, कोटगढ़ और कुमारसेन के कई इलाकों में बागवान पेड़ों से लगातार गिर रहे फलों को देखकर चिंतित हैं। यदि आगामी दिनों में मौसम ने फिर करवट बदली तो इस बार प्रदेश का कुल सेब उत्पादन एक करोड़ पेटियों के आसपास सिमट सकता है।

हिमाचल की अर्थव्यवस्था में सेब बागवानी की अहम भूमिका
हिमाचल की अर्थव्यवस्था में सेब बागवानी की अहम भूमिका है। प्रदेश के लगभग अढ़ाई लाख से अधिक परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यवसाय से जुड़े हैं। सामान्य वर्षों में हिमाचल से पांच से छह करोड़ पेटियों तक सेब का उत्पादन होता रहा है, लेकिन इस बार शुरुआती संकेत उत्साहजनक नहीं हैं। कई क्षेत्रों में पेड़ों पर फल की संख्या पहले से ही कम दिखाई दे रही है और लगातार हो रही ड्रॉपिंग ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
मौसम का पूरा चक्र असामान्य रहा
बागवानों का कहना है कि इस बार मौसम का पूरा चक्र असामान्य रहा है। मार्च और अप्रैल के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहने के कारण कई क्षेत्रों में नमी की कमी महसूस की गई। इसके बाद मई महीने में बीच-बीच में हुई बारिश, तेज हवाएं और कुछ स्थानों पर ओलावृष्टि ने फसल को नुकसान पहुंचाया। मौसम में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव का सीधा असर फल सेटिंग और उसके विकास पर पड़ा है। सेब की फसल के शुरुआती विकास चरण में मौसम का संतुलित रहना अत्यंत आवश्यक माना जाता है, लेकिन इस बार यह संतुलन लगातार बिगड़ा हुआ दिखाई दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में अचानक बदलाव, नमी की कमी और तेज हवाओं के कारण फल गिरने की प्रक्रिया तेज हुई है।
जून का महीना इस बार निर्णायक साबित होगा : बागवान
बागवानों के अनुसार जून का महीना इस बार निर्णायक साबित होगा। यदि इस दौरान तेज आंधी, तूफान, ओलावृष्टि या लगातार बारिश का दौर चलता है तो पेड़ों पर बचे हुए फलों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इससे उत्पादन में और गिरावट आने की संभावना है। यही कारण है कि प्रदेशभर के बागवानों की निगाहें मौसम पर टिकी हुई हैं। कई बागवानों का कहना है कि उत्पादन कम होने की स्थिति में उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा। पहले ही बढ़ती लागत, महंगे कीटनाशक, खाद और मजदूरी के खर्च ने बागवानी को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे में यदि उत्पादन घटता है, तो आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।
विशेषज्ञ बोले-ड्रॉपिंग प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा
हालांकि बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में हो रही ड्रॉपिंग का एक हिस्सा प्राकृतिक प्रक्रिया भी है। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एसपी भारद्वाज के अनुसार सेब के पेड़ों पर जब आवश्यकता से अधिक फल लग जाते हैं तो कमजोर फल स्वत: गिर जाते हैं और मजबूत फल ही अंत तक टिके रहते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दिनों में मौसम ने कुछ राहत दी है, जिससे पेड़ों पर बचे हुए फलों के आकार में तेजी से वृद्धि होने की संभावना बनी हुई है। यदि आने वाले दिनों में मौसम सामान्य रहता है तो फलों की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है और बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना भी रहेगी।
वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से फलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बेहतर बनाया जा सकता
डॉ. भारद्वाज ने बागवानों से घबराने के बजाय बागों की नियमित देखभाल, संतुलित पोषण प्रबंधन और रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की अपील की है। उनका कहना है कि सही समय पर वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से पेड़ों पर टिके हुए फलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है।
गुणवत्ता पर टिकी उम्मीदें
हालांकि उत्पादन कम रहने की आशंका है, लेकिन कुछ बागवान अभी भी उम्मीद लगाए हुए हैं कि यदि जून और जुलाई में मौसम अनुकूल रहा तो पेड़ों पर बचे फलों का आकार और गुणवत्ता बेहतर होगी। ऐसी स्थिति में बाजार में अच्छे दाम मिलने से उत्पादन में कमी की कुछ हद तक भरपाई हो सकती है। फिलहाल प्रदेश के सेब बहुल क्षेत्रों में चिंता और उम्मीद दोनों साथ-साथ चल रही हैं। मौसम का हर नया बदलाव बागवानों के लिए नई चुनौती और नई उम्मीद लेकर आ रहा है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि हिमाचल का सबसे बड़ा नकदी फसल क्षेत्र इस साल राहत की सांस लेगा या फिर उत्पादन में बड़ी गिरावट का सामना करेगा।








