शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारीकरण किए गए निजी सहायता प्राप्त कॉलेजों के शिक्षकों को राहत देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि जिन निजी सहायता प्राप्त कॉलेजों का बाद में सरकारीकरण किया गया, वहां शिक्षकों द्वारा सरकारीकरण से पहले दी गई पूरी सेवा अवधि को पेंशन, ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट जैसे सेवानिवृत्ति लाभों की गणना में शामिल करना अनिवार्य होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक कॉलेजों में सेवाएं देने वाले शिक्षकों की पूर्व सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने अपने फैसले में कहा कि जिन शिक्षकों ने कॉलेजों के विकास और विद्यार्थियों की शिक्षा में अपना पूरा कार्यकाल समर्पित किया है, उनके साथ केवल इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता कि कॉलेज का सरकारीकरण बाद में हुआ। अदालत ने माना कि ऐसे शिक्षकों की सेवाओं को निरंतर सेवा के रूप में देखा जाना चाहिए और उन्हें सेवानिवृत्ति संबंधी सभी लाभ मिलने चाहिए।
मामला कांगड़ा जिले के बैजनाथ स्थित गोस्वामी गणेश दत्त सनातन धर्म कॉलेज से जुड़ा है। याचिकाकर्ता वर्ष 1983 में इस कॉलेज में लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए थे, जिसे अब असिस्टेंट प्रोफेसर का पद कहा जाता है। यह कॉलेज प्रदेश सरकार से 95 प्रतिशत ग्रांट-इन-एड प्राप्त करता था और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से संबद्ध था। कॉलेज में शिक्षकों की नियुक्तियां विश्वविद्यालय के निर्धारित नियमों और योग्यताओं के अनुसार की गई थीं तथा उन्हें विश्वविद्यालय की मंजूरी भी प्राप्त थी।
राज्य सरकार ने 8 फरवरी 2007 को अधिसूचना जारी कर 4 जनवरी 2007 से इस कॉलेज और इसके कर्मचारियों का सरकारीकरण कर लिया था। हालांकि सरकार ने सरकारीकरण से पहले शिक्षकों द्वारा दी गई लगभग 20 से 24 वर्षों की सेवा को पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की गणना में शामिल करने से इंकार कर दिया था। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि सहायता प्राप्त कॉलेजों में कार्यरत शिक्षक का पद और दायित्व सरकारी कॉलेजों के शिक्षकों के समान होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा ऐसे संस्थानों को 95 प्रतिशत वित्तीय सहायता देने का उद्देश्य शिक्षकों को सेवा सुरक्षा और पेंशन सहित अन्य लाभ उपलब्ध कराना है। ऐसे में उनकी पूर्व सेवा को सेवानिवृत्ति लाभों की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता।
बकाया राशि पर देरी के लिए छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं की बैजनाथ कॉलेज में उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि, यानी वर्ष 1983 से लेकर पूरी सेवा अवधि को पेंशन, ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट के लिए गिना जाए। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि तीन महीने के भीतर सभी वित्तीय और सेवानिवृत्ति लाभ जारी किए जाएं। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है तो बकाया राशि पर देरी की अवधि के लिए छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।








