शिमला। हिमाचल प्रदेश की नदियों में जमा मलबे, सिल्ट और खनिज सामग्री को लेकर विधानसभा में गुरुवार को जोरदार चर्चा हुई। सरकार अब ड्रेजिंग और माइनिंग की व्यवस्था को अलग-अलग और व्यवस्थित करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि इसके लिए अलग माइनिंग विभाग बनाने और नई ड्रेजिंग नीति लाने पर काम किया जा रहा है। सरकार का अनुमान है कि प्रदेश की पांच प्रमुख नदियों में व्यवस्थित ड्रेजिंग और डिलिस्टिंग की जाए तो इससे हर साल 2,000 से 3,000 करोड़ रुपये तक की आय का रास्ता खुल सकता है।

ड्रेजिंग और माइनिंग को अलग व्यवस्था में लाएगी सरकार
बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी के सवाल के जवाब के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि नदियों में जमा सामग्री को व्यवस्थित तरीके से हटाने की जरूरत है। सरकार इस पूरी प्रक्रिया के लिए दूसरे राज्यों की व्यवस्थाओं का भी अध्ययन कर रही है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक:
- हिमाचल में पांच प्रमुख नदियां हैं।
- इनकी व्यवस्थित ड्रेजिंग से बड़ी मात्रा में सामग्री निकाली जा सकती है।
- इससे राज्य को हजारों करोड़ रुपये की संभावित आय हो सकती है।
- केंद्र सरकार के साथ नियमों में बदलाव को लेकर बातचीत चल रही है।
- ड्रेजिंग और माइनिंग की अलग-अलग व्यवस्था को स्पष्ट किया जाएगा।
2023 की आपदा के बाद शुरू हुई ड्रेजिंग की चर्चा
मुख्यमंत्री ने बताया कि 2023 की प्राकृतिक आपदा के बाद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने नदियों में जमा सामग्री हटाने के लिए ड्रेजिंग कराने का सुझाव दिया था। इसके बाद उद्योग विभाग के माध्यम से ड्रेजिंग की अनुमति दी गई। हालांकि सरकार के पास ड्रेजिंग के बाद सामग्री निकालने का अधिकार था, लेकिन माइनिंग की अनुमति नहीं मिल पाई। नतीजा यह हुआ कि अगली बरसात में नदी में जमा काफी सामग्री दोबारा बह गई।
केंद्र के साथ फिर हुई चर्चा
मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्र के साथ चर्चा के बाद कुल्लू में तीन साइट चिन्हित की गईं। ड्रेजिंग की अनुमति मिलने के बाद ठेकेदार ने माइनिंग विभाग में एम-फॉर्म के लिए आवेदन किया था और उसे डब्ल्यू-फॉर्म मिले। हाल की एक बैठक में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ड्रेजिंग के दौरान रॉयल्टी नहीं लेने का सुझाव दिया। हालांकि राज्य सरकार का मानना है कि रॉयल्टी लेना उसका अधिकार है।
वन निगम के जरिए हो रही ड्रेजिंग
मुख्यमंत्री ने कहा कि नदियों में ड्रेजिंग का काम वन निगम के माध्यम से किया जा रहा है। इससे फिलहाल राज्य को करीब 100 से 200 करोड़ रुपये तक की आय हो रही है। वहीं, उन्होंने कहा कि माइनिंग से अभी इतनी आय नहीं हो रही है। सरकार का उद्देश्य अब दोनों प्रक्रियाओं को स्पष्ट नियमों और पारदर्शी व्यवस्था के तहत संचालित करना है।
उद्योग मंत्री बोले- ड्रेजिंग और माइनिंग अलग प्रक्रियाएं
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग और माइनिंग एक जैसी प्रक्रियाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ड्रेजिंग के लिए नई नीति तैयार करेगी। अदालत के फैसलों के अनुसार ड्रेजिंग से निकली सामग्री की नीलामी की जा सकती है, लेकिन सीधे बिक्री नहीं की जा सकती। मंत्री ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती वन संरक्षण अधिनियम के तहत मंजूरी प्राप्त करना है।
हिमाचल में 324 साइट, सिर्फ 5-6 को वन मंजूरी
हर्षवर्धन चौहान के अनुसार पूरे हिमाचल में करीब 324 साइट चिन्हित हैं। इनमें अभी तक केवल पांच-छह स्थानों पर वन मंजूरी मिल पाई है। कुल्लू में 44 साइटों की नीलामी की गई थी, लेकिन वन मंजूरी नहीं मिलने के कारण कई स्थानों पर डीएफओ ने सामग्री उठाने की अनुमति नहीं दी। केंद्र सरकार की ओर से भी इस समस्या के समाधान के लिए संयुक्त बैठक बुलाई गई है।
कुल्लू में 19 साइटों का पुराना मामला
मंत्री ने बताया कि वर्ष 2018 में कुल्लू में ब्यास नदी के 19 स्थलों की नीलामी की गई थी। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत जरूरी मंजूरी नहीं मिलने के कारण इनमें से 15 स्थल निरस्त कर दिए गए। चार स्थलों के सफल बोलीदाता अभी मंजूरी की प्रक्रिया में हैं। वर्तमान में वन विभाग कुल्लू में ब्यास नदी के तीन स्थलों पर ड्रेजिंग कर रहा है। वहीं बंजार क्षेत्र में ड्रेजिंग और माइनिंग के सात स्थल चिन्हित किए गए हैं।
2023 की बाढ़ के बाद करोड़ों रुपये ड्रेजिंग पर खर्च
2023 की बाढ़ के बाद नदी-नालों में जमा सामग्री हटाने के लिए सरकार ने बड़ी राशि खर्च की।
वर्ष 2024 में:
- मनाली उपमंडल: करीब 1.22 करोड़ रुपये
- कुल्लू: करीब 5.72 करोड़ रुपये
- बंजार: करीब 2.98 करोड़ रुपये
ड्रेजिंग पर खर्च किए गए। इसी वर्ष ड्रेजिंग के लिए करीब 2.24 करोड़ रुपये की नीलामी हुई, जिससे लगभग 50 लाख रुपये प्राप्त हुए। हालांकि 2025 में दोबारा हुई बारिश के कारण नदी में जमा सामग्री का बड़ा हिस्सा फिर बह गया।
विपक्ष ने उठाए सवाल, घोटाले की आशंका जताई
विधानसभा में इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी सरकार से कई सवाल पूछे। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने ब्यास नदी में रात के समय मशीनों से सामग्री निकाले जाने का आरोप लगाते हुए पूछा कि निकाली गई सामग्री आखिर कहां गई और इससे सरकार को कितना राजस्व प्राप्त हुआ। उन्होंने मामले को गंभीर बताते हुए घोटाले की आशंका जताई और पूरी जानकारी सदन में रखने की मांग की। वहीं भाजपा विधायक विक्रम ठाकुर ने पूछा कि माइनिंग का काम वन निगम को क्यों दिया गया और अब तक कितने एम-फॉर्म जारी किए गए हैं।
सिल्ट के निपटारे का भी बड़ा सवाल
सुंदरनगर के विधायक राकेश जंबाल ने ड्रेजिंग से निकलने वाली सिल्ट के निपटारे का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सुकेत खड्ड में सिल्ट डालने से बल्ह घाटी में परेशानी पैदा होती है। इस पर उद्योग मंत्री ने कहा कि डैम साइटों पर लगातार सिल्ट जमा हो रही है और ड्रेजिंग से निकलने वाली पूरी सामग्री उपयोगी नहीं होती। हाइड्रो कंपनियों को अपने स्तर पर सामग्री निकालने और उसके निपटारे की व्यवस्था करनी होगी।
माइनिंग से बढ़ी सरकार की कमाई
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने विधानसभा में माइनिंग से मिलने वाले राजस्व का भी आंकड़ा रखा। उनके अनुसार वर्ष 2024-25 में हिमाचल को माइनिंग से 356 करोड़ रुपये की रॉयल्टी आय हुई। पिछली सरकार के समय यह आंकड़ा करीब 240 करोड़ रुपये था। मंत्री ने दावा किया कि नई माइनिंग नीति लागू होने के बाद राज्य के राजस्व में बढ़ोतरी हुई है।








