शिमला के शोघी में 11 से 16 नवंबर तक चीड़ की पत्तियों से आजीविका को कैसे मजबूत किया जाए, इसको लेकर छह दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के तहत शिमला, सोलन, चंबा तथा लाहौल-स्पीति की 35 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया।
कार्यशाला में महिलाओं को बताया गया कि चीड़ की पत्तियों से उत्पाद बनाकर महिलाएं अपनी आर्य अर्जित कर सकती है और जंगलों से इन्हें हटाकर वनों को आग से बचाया जा सकता है। महिलाओं को बताया गया कि इसके जरीये आसानी से महिलाएं अपनी अच्छी आय अर्जित कर सकती है। प्रतिभागियों को चीड़ की पत्तियों से हस्तशिप उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला में महिलाओं को टेबल मैट, कोस्टर, टोकरी, फूलदान, ट्रे आदि बनाना सिखाया गया।
इसके अलावा चीड़ की पत्तियों से ब्रिक ईंट बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। इस ब्रिक का उपयोग ईंधन के रूप में खाना बनाने, पानी गर्म करने तथा ठंड से बचने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इन्हें बेचकर आय भी अर्जित की जा सकती है। कार्यशाला के समापन अवसर पर प्रतिभागियों ने अपने बनाए उत्पादों की प्रर्दशनी भी लगाई। सभी को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।
चीड़ की पत्तियों से विशेष उत्पाद बनाने की यह पहल सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत है। जहां पहले जंगलों में बेकार समझी जाने वाली चीड़ की पत्तियां आगजनी का कारण बनती थीं, वहीं अब यही पत्तियां महिलाओं की आर्थिक मजबूती का जरिया बनेंगी। इससे न सिर्फ ग्रामीण महिलाओं को घर-आंगन में ही रोजगार मिलेगा, बल्कि स्थानीय उत्पादों की बाज़ार में नई पहचान भी बनेगी।
यह कदम महिलाओं को आय के स्थायी स्रोत उपलब्ध कराते हुए पहाड़ी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।