शिमला ग्रामीण क्षेत्र के गांव हिमरी और आसपास संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध सड़क निर्माण, अवैध खनन और लकड़ी की तस्करी के गंभीर आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति सक्रिय हो गई है। समिति ने वन विभाग, लोक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को जवाबदेही तय करने के लिए तलब किया है।
यह कार्रवाई याचिकाकर्ता विजयेंद्र पाल सिंह द्वारा दायर इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन के तहत की गई है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 25 जून 2025 के उस आदेश से संबंधित है जिसमें प्रस्तावित हिमरी- नल्लाह सडक़ परियोजना के लिए 875 पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से हाल ही में प्रस्तुत दस्तावेजों में दावा किया गया है कि वन स्वीकृतियां हासिल करने के लिए रिकॉर्ड में हेरफेर और अभिलेखों की जालसाजी की गई। आरोप है कि संरक्षित वन क्षेत्र के भीतर 17 किलोमीटर से अधिक अवैध सड़कों का निर्माण किया गया और इसके लिए स्थानीय प्रशासनिक व पंचायत निधियों का दुरुपयोग किया गया।
दस्तावेजों में कथित तौर पर स्थानीय प्रशासन और प्रभावशाली वन माफिया की मिलीभगत का भी जिक्र है जिसके चलते अवैध खनन और लकड़ी तस्करी को संरक्षण मिला।
याचिकाकर्ता ने बताया कि मामले की शिकायतें राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो तक पहुंचाई गई लेकिन अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। इस आधार पर उन्होंने मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपने की मांग की है।
यह मुद्दा हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में भी एक लोकहित याचिका के रूप में विचाराधीन है। पर्यावरण संगठन पहाड़ी समाज पर्यावरणीय कवच ने भी मामले में हस्तक्षेप किया है और पर्यावरणीय क्षरण पर न्यायिक निगरानी की मांग की है।
सीईसी की अगली सुनवाई में वन स्वीकृति रिकॉर्ड, जिला अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका तथा किए गए पर्यावरणीय नुकसान की विस्तृत जांच होने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि इस मामले का प्रभाव हिमाचल में वन प्रशासन, पारदर्शिता और पर्यावरणीय जवाबदेही पर दूरगामी होगा।