चंद्रमोहन चौहान। ऊना
जिला ऊना में पशुपालन विभाग की लापरवाही अब पशुपालकों के लिए एक गंभीर संकट का रूप ले चुकी है। विभाग के पास लंबे समय से दवाइयों का स्टॉक नहीं है और पिछले डेढ़ वर्ष से विभाग पशुओं के इलाज के लिए आवश्यक दवाइयों की सप्लाई हेतु कोई टेंडर ही जारी नहीं कर पाया है। इस कारण पशुपालक अपने बीमार पशुओं को लेकर भारी परेशानी और आर्थिक बोझ का सामना कर रहे हैं।
दवाइयों की कमी का संकट वर्ष 2023 से लगातार गहराता जा रहा है। विभागीय स्तर पर टेंडर प्रक्रिया में देरी, आपूर्ति व्यवस्था में कमजोरियों और प्रशासनिक उदासीनता ने हालात को और बिगाड़ दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पशुओं की बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, वहीं सरकारी पशु चिकित्सालयों और पशु औषधि केंद्रों में एक भी जरूरी दवा उपलब्ध नहीं है।
पशुपालक बताते हैं कि उन्हें निजी मेडिकल स्टोरों से महंगी कीमत पर दवाइयां खरीदकर अपने मवेशियों का इलाज करवाना पड़ रहा है। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर भारी बोझ पड़ रहा है, बल्कि पशुपालन व्यवसाय भी लगातार घाटे में जाता दिख रहा है।
पशुपालकों में जसबीर सिंह, सर्वजीत सिंह, राजेंद्र सिंह और प्रेम सिंह औजला ने बताया कि पहले सरकारी पशुपालन विभाग की डिस्पेंसरी में कई जरूरी दवाएं मुफ्त या बेहद कम कीमत में उपलब्ध हो जाती थीं। इससे छोटे पशुपालकों को काफी राहत मिलती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। बेसिक एंटीबायोटिक, इंजेक्शन, विटामिन सप्लीमेंट और सामान्य बीमारी के उपचार की दवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
पशुपालकों का कहना है कि पशुओं के बीमार होने पर उन्हें इलाज और दवाइयों के लिए कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है। ऐसे में पशुपालकों का धंधा मुश्किल में आ गया है और सरकारी व्यवस्था पर उनका भरोसा टूट रहा है।
गांवों में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई पशुपालक अपने बीमार पशुओं का समय पर उपचार न होने से चिंतित हैं। कुछ मामलों में मवेशियों की मौत के भी मामले सामने आ रहे हैं।
पशुपालकों का कहना है कि प्रशासन को तुरंत संज्ञान लेकर दवाइयों की आपूर्ति बहाल करनी चाहिए, अन्यथा पशुपालन क्षेत्र पूरी तरह संकट में घिर जाएगा।
पिछले कुछ समय से दवाइयों का रेट कांट्रेक्ट न हो पाने के कारण यह समस्या सामने आई थी। अब विभाग द्वारा रेट कांट्रेक्ट प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्द ही पशु पलकों को सरकारी स्तर पर दवाइयां उपलब्ध हो जाएंगी।





