हिमाचल दस्तक, डेस्क। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के शीतकालिन सत्र में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा उठाया गया सवाल…5000 करोड़ कहां हैं?…सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि एक ऐसे राज्य की चिंता है जो पहले ही वित्तीय दबाव, आपदा राहत की कमी और कर्ज़ बोझ से जूझ रहा है। जब मुख्यमंत्री सदन में यह पूछते हैं कि पिछली सरकार ने जिन फैसलों, पैकेजों और भूमि सौदों के नाम पर राज्य के संसाधनों को इस्तेमाल किया, उनका लेखा-जोखा आखिर कहां दर्ज है, तो यह सीधे-सीधे पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की मांग है।
दरअसल, राज्य की आर्थिक स्थिति किसी भी सरकार की प्राथमिक कसौटी होती है। चुनावी साल में की गई रेवड़ी घोषणाएं उद्योगों को “कस्टमाइज्ड पैकेज” के नाम पर दी गई छूटें और जमीन के बड़े हस्तांतरण तभी स्वीकार्य माने जा सकते हैं जब वे सार्वजनिक हित में प्रमाणित हों। लेकिन यदि सरकार बदलने के बाद इन फैसलों पर सवाल उठते हैं और आंकड़ों में अस्पष्टता नज़र आती है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है।
इस मुद्दे का राजनीतिकरण दोनों पक्ष कर सकते है…वर्तमान सरकार के लिए यह पिछली सरकार पर निशाना साधने का मौका है, जबकि विपक्ष इसे “राजनीतिक नरेटिव” बताकर खारिज कर रहा है। मगर असली सवाल यह नहीं कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है। असली सवाल यह है कि क्या जनता को उनके धन का वास्तविक हिसाब मिल पा रहा है?
अब ज़रूरत इस बात की है कि बिना पक्षपात के एक स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। हर दस्तावेज़…..भूमि आवंटन, पैकेज, छूट, फंड ट्रांसफर सार्वजनिक किया जाए। यदि वास्तव में 5000 करोड़ से जुड़े फैसलों में अनियमितता है, तो ज़िम्मेदारों हिमाचल प्रदेश की जनता ऐसे प्रश्नों का स्पष्ट और ठोस उत्तर चाहती है। इसलिए यह मामला अंक जुटाने का नहीं, बल्कि शासन में विश्वास बहाल करने का है। “5000 करोड़ कहां हैं…. यह सवाल आज हिमाचल की आर्थिक नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।